भगवद गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानंअध्याय 6श्लोक 5
Read in Englishउद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet, ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
हिंदी अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा स्वयं का उद्धार करे और स्वयं को नीचे न गिरने दे। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
प्रसंग
छठा अध्याय इस बात से शुरू होता है कि सच्चा संन्यास काम छोड़ देना नहीं है। फिर ध्यान सिखाने से पहले कृष्ण ज़िम्मेदारी वहां रखते हैं जहां वह होनी चाहिए।
इसका अर्थ
आपके भीतर का काम कोई और आपके लिए नहीं कर सकता। आपका अपना मन आपको ऊपर उठा भी सकता है और नीचे गिरा भी सकता है, इसलिए ज़िम्मेदारी और ताक़त दोनों आपके पास हैं।
गहराई से
संस्कृत में एक ही शब्द बार-बार आता है, 'आत्मा', जिसका अर्थ स्वयं भी है और मन भी। 'उद्धरेदात्मनात्मानं' का शाब्दिक अर्थ है 'स्वयं से स्वयं को उठाओ।'
जो उठा रहा है, वही उठाया जा रहा है। यह बात असहज करती है, क्योंकि इसका मतलब है कि यह कोई और आपके लिए नहीं कर सकता। पर असली ताक़त भी यहीं है।
आपके जीवन में
किसी बुरे दिन पर लिखें कि आपका मन आपके बारे में क्या कह रहा है। फिर लिखें कि असल में सच क्या है, आपके बस में क्या है, और अगला छोटा कदम क्या है।
यह दूसरी सूची उसी मन का मित्र वाला रूप है।
अपने ही मन के सहारे स्वयं को ऊपर उठाएं। यह आपका सबसे करीबी मित्र भी हो सकता है और सबसे बड़ा शत्रु भी।
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