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भगवद गीता 2.40

नेहाभिक्रमनाशोऽस्तिअध्याय 2श्लोक 40

Read in English

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥

nehābhikrama-nāśo 'sti pratyavāyo na vidyate, svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt

हिंदी अनुवाद

इस मार्ग में किया गया प्रयास कभी नष्ट नहीं होता, और इसमें उल्टा फल भी नहीं मिलता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से रक्षा करता है।

प्रसंग

कृष्ण ने अभी अर्जुन से कहा है कि अब वे सिद्धांत से अभ्यास की ओर, यानी कर्मयोग की ओर बढ़ रहे हैं। इसके बारे में वे जो पहली बात कहते हैं, वह एक भरोसा है।

इसका अर्थ

इस अभ्यास में कोई भी सच्चा प्रयास कभी बेकार नहीं जाता, चाहे वह कितना भी छोटा या अधूरा हो। थोड़ा-सा भी काम आता है।

गहराई से

यह श्लोक ग़लत शुरुआत के डर को संबोधित करता है। किसी कर्मकांड में एक ग़लती पूरे अनुष्ठान को बिगाड़ सकती है, और अधूरा अनुष्ठान कोई फल नहीं देता।

कृष्ण कहते हैं कि यह अभ्यास ऐसा नहीं है। अधूरा प्रयास भी नष्ट नहीं होता, और कोशिश करने की कोई सज़ा नहीं है। शुरुआत की सीमा जितनी नीचे हो सकती है, उतनी नीचे रखी गई है।

आपके जीवन में

कोई ऐसा काम चुनें जिसे आप इसलिए टालते रहे हैं क्योंकि अभी ठीक से नहीं कर पाते: ध्यान, व्यायाम या कोई कठिन प्रोजेक्ट। आज उसे दस मिनट दीजिए।

यह श्लोक कहता है कि वे दस मिनट गिने जाते हैं, तो आज़माकर देखिए।

याद रखने की बात

कोई भी सच्चा प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। थोड़ा सा प्रयास भी आपकी रक्षा करता है।

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