भगवद गीता 5.10
ब्रह्मण्याधाय कर्माणिअध्याय 5श्लोक 10
Read in Englishब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karoti yaḥ, lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā
हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति सभी कर्मों को ब्रह्म को अर्पित करके और आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी से।
प्रसंग
अर्जुन ने पूछा है कि कर्म का त्याग बेहतर है या कर्म करना। कृष्ण कहते हैं कि कर्म करना बेहतर है, और यहां वे दिखाते हैं कि कोई कर्म करते हुए भी उसमें फंसे बिना कैसे रह सकता है।
इसका अर्थ
आप संसार में पूरी तरह शामिल रहकर भी उससे दाग़दार हुए बिना रह सकते हैं। कुंजी यह है कि अपना काम अर्पित कर दें, उससे मिलने वाली चीज़ों को कसकर न पकड़ें।
गहराई से
कमल का पत्ता भारतीय चिंतन का एक जाना-पहचाना उदाहरण है। वह पानी में उगता है और पानी पर ही रहता है, फिर भी बूंदें उससे सीधे फिसल जाती हैं।
पत्ता पानी से बच नहीं रहा। वह पूरी तरह उसी में है। यही चित्र कृष्ण उस व्यक्ति का देते हैं जो काम में पूरी तरह लगा है, पर नतीजों में भीगता नहीं।
आपके जीवन में
ध्यान दीजिए कि क्या आपके काम पर मिली प्रतिक्रिया कई दिनों तक यह तय करती है कि आप ख़ुद के बारे में कैसा महसूस करते हैं।
अगर हां, तो अगले काम को अपने बारे में किसी फ़ैसले की तरह नहीं, बल्कि किसी को दी गई चीज़ की तरह देखिए। इसी से प्रतिक्रिया आप पर से फिसल पाती है।
काम में रहें, पर उसके नतीजे से बेदाग़ रहें। जैसे पानी में कमल का पत्ता।