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भगवद गीता 9.22

अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्अध्याय 9श्लोक 22

Read in English

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

ananyāś cintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate, teṣāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣemaṁ vahāmy aham

हिंदी अनुवाद

जो लोग अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और सदा मुझमें लगे रहते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं।

प्रसंग

कृष्ण ने अभी उन लोगों की बात की है जो स्वर्ग के सुख पाने के लिए पूजा करते हैं। उन्हें वह मिलता है, पर पुण्य ख़त्म होने पर वे लौट आते हैं। फिर कृष्ण उन लोगों की ओर मुड़ते हैं जो केवल उन पर भरोसा करते हैं।

इसका अर्थ

जब आपका ध्यान पूरी तरह ईश्वर की ओर होता है, तो आपकी दोनों तरफ़ से देखभाल होती है। जो आपके पास नहीं है वह मिलता है, और जो है वह सुरक्षित रहता है।

गहराई से

यहां शब्द है 'योगक्षेमं वहाम्यहम्', यानी मैं उनका योग और क्षेम वहन करता हूं। योग का अर्थ है जो नहीं है उसे पाना, और क्षेम का अर्थ है जो है उसकी रक्षा करना। भारत में यह पंक्ति एक और कारण से भी जानी जाती है: यह भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) का आदर्श वाक्य है।

पर यह श्लोक कोई सौदा नहीं है। यह बताता है कि क्या होता है जब ध्यान हर संभावित कमी के बीच बंटना बंद कर देता है।

आपके जीवन में

ध्यान दीजिए कि आपकी कितनी ऊर्जा इस चिंता में जाती है कि समय, पैसा या मदद काफ़ी होगी या नहीं। इस हफ़्ते किसी एक काम को अपना पूरा ध्यान दीजिए और चिंता को जानबूझकर बाद के लिए छोड़ दीजिए।

फिर देखिए कि उस शोर के बिना काम कैसा लगता है।

याद रखने की बात

जब आपका ध्यान पूरी तरह एकाग्र होता है, तो जो सच में ज़रूरी है वह अपने आप मिल जाता है।

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