भगवद गीता 11.12
दिवि सूर्यसहस्रस्यअध्याय 11श्लोक 12
Read in Englishदिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā, yadi bhāḥ sadṛśī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ
हिंदी अनुवाद
यदि आकाश में हज़ार सूर्य एक साथ उदय हो जाएं, तो उनका प्रकाश शायद उस महात्मा के तेज के समान हो।
प्रसंग
अर्जुन ने कृष्ण का विश्वरूप देखने की इच्छा की है, और कृष्ण ने उन्हें उसे देखने के लिए दिव्य दृष्टि दी है। इस श्लोक में कथावाचक संजय यह बताने की कोशिश करते हैं कि अर्जुन क्या देख रहे हैं।
इसका अर्थ
अर्जुन जो देख रहे हैं, वह इतना तेजस्वी है कि सामान्य शब्द कम पड़ जाते हैं। संजय इससे बेहतर कुछ नहीं कह पाते कि आकाश में एक साथ जलते हज़ार सूर्य शायद उसके पास पहुंच सकें।
गहराई से
यह श्लोक 1945 में भारत के बाहर भी प्रसिद्ध हो गया। कहा जाता है कि जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर को पहले परमाणु बम का परीक्षण देखते हुए यही पंक्ति याद आई थी। बरसों बाद उन्होंने इसी अध्याय का एक और श्लोक उद्धृत किया, 'अब मैं मृत्यु बन गया हूं।'
गीता में यह उदाहरण विशालता के बारे में है। ईश्वर मानवीय दृष्टि के लिए बहुत विशाल है, इसलिए कृष्ण को अर्जुन को उसे देखने के लिए ख़ास आंखें देनी पड़ती हैं।
आपके जीवन में
जब कोई चीज़ आपको इतना छू जाए कि आप उसे बता न सकें, किसी का जन्म, कोई पहाड़ या कोई संगीत, तो उसे एक पल के लिए शब्दों से परे रहने दीजिए।
गीता के अपने कथावाचक के पास यहां शब्द कम पड़ जाते हैं, और वे इसका दिखावा नहीं करते।
अगर आकाश में एक साथ हज़ार सूरज उग जाएँ, तो शायद वह उस प्रकाश के समान हो।
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