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भगवद गीता 14.26

मां च योऽव्यभिचारेणअध्याय 14श्लोक 26

Read in English

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

māṁ ca yo 'vyabhicāreṇa bhakti-yogena sevate, sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate

हिंदी अनुवाद

जो व्यक्ति अटल भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्म को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।

प्रसंग

अर्जुन ने पूछा है कि कोई तीनों गुणों के पार कैसे जाता है, यानी प्रकृति के वे गुण जो हर मनोदशा और हर आवेग के पीछे हैं। कृष्ण ने बताया है कि ऐसा व्यक्ति कैसा दिखता है, और अब बताते हैं कि वहां पहुंचा कैसे जाता है।

इसका अर्थ

अपनी मनोदशाओं और आवेगों के खिंचाव से आगे जाने का रास्ता इच्छाशक्ति का कोई अचानक ज़ोर नहीं है। यह लंबे समय तक बनाए रखी गई स्थिर, निष्ठावान भक्ति है।

गहराई से

तीन गुण हैं: सत्त्व (स्पष्टता), रजस (बेचैन सक्रियता) और तमस (भारीपन)। गीता कहती है कि मन की हर अवस्था इन्हीं का कोई मिश्रण है।

इनके पार जाने का कृष्ण का उत्तर ज़्यादा मेहनत या ज़्यादा ज्ञान नहीं है। उत्तर है 'अव्यभिचारेण', यानी ऐसी भक्ति जो भटकती नहीं। यहां निरंतरता मांगी गई है, तीव्रता नहीं।

आपके जीवन में

अगर आप चीज़ों को पूरे ज़ोर से शुरू करके जल्दी थक जाते हैं, तो उल्टा करके देखिए। इतना छोटा रूप चुनिए जिसे आप अपने सबसे बुरे दिन भी कर सकें, और उसे एक महीने तक चलाइए।

लंबे समय में स्थिरता हमेशा तीव्रता से जीतती है।

याद रखने की बात

तीव्रता नहीं, स्थिरता ही आपको आगे ले जाती है। एक शांत, अटूट प्रयास ही काफी है।

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