भगवद गीता 6.26
यतो यतो निश्चरतिअध्याय 6श्लोक 26
Read in Englishयतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
yato yato niścarati manaś cañcalam asthiram, tatas tato niyamyaitad ātmany eva vaśaṁ nayet
हिंदी अनुवाद
यह चंचल और अस्थिर मन जहां-जहां भटके, वहां-वहां से उसे हटाकर बार-बार आत्मा के वश में लाना चाहिए।
प्रसंग
यहां कृष्ण ध्यान के व्यावहारिक निर्देश दे रहे हैं। उन्होंने अभी अर्जुन से कहा है कि मन को धीरे-धीरे, कदम-दर-कदम शांत करो।
इसका अर्थ
मन भटकेगा। अभ्यास बस इतना है कि हर बार उसे वापस लाया जाए, बिना झुंझलाए, जितनी बार भी ज़रूरत हो।
गहराई से
यह निर्देश लगभग यांत्रिक है, और यही इसकी ताक़त है। कोई ख़ास तकनीक नहीं, बस एक चक्र: मन जाता है, आप ध्यान देते हैं, और आप उसे वापस लाते हैं।
'यतो यतो', यानी जहां-जहां और जब-जब, यह मानकर चलता है कि भटकना होता रहेगा। अभ्यास लौटाने में है, ऐसे मन में नहीं जो कभी न भटके।
आपके जीवन में
जब आपका ध्यान किसी बातचीत या काम से फिसल जाए, तो भीतर की लंबी सांस के बिना वापस आइए। हर वापसी को जिम की एक रेप की तरह गिनिए।
पचास बार लौटने वाला दिन असफल दिन नहीं है। वह पचास रेप हैं।
मन भटकता है। आप ध्यान देते हैं, और उसे वापस लाते हैं। यही साधना है, बार-बार।
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6.40
जो भला करता है, उसका कभी बुरा अंत नहीं होता।
4.7
जहां भी अच्छाई कमज़ोर पड़ती है, उसे फिर से जगाने की शक्ति भी वहीं उठती है।
2.40
कोई भी सच्चा प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। थोड़ा सा प्रयास भी आपकी रक्षा करता है।
6.5
अपने ही मन के सहारे स्वयं को ऊपर उठाएं। यह आपका सबसे करीबी मित्र भी हो सकता है और सबसे बड़ा शत्रु भी।